Thursday, November 22, 2018

अली फजल, पंकज त्रिपाठी की वेब सीरीज मिर्जापुर में कहां हो गई चूक?

मिर्जापुर एक अच्छी कहानी हो सकती थी. लेकिन रियलिटी के नाम पर सेक्स, वायलेंस और कई बेसिर पैर की बातें निराश करती हैं. स्थानीयता यानी किरदारों की भाषा, पहनावे और लोकेशंस पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया. कहानी के मूड में तमाम चीजों का न होना निराश करता है. हालांकि सिनेमा या सीरीज की अपनी मजबूरियां होती हैं. फिल्म और सीरीज का निर्माण भी एक एक व्यापक दर्शक वर्ग के लिए किया जाता है. लेकिन जब वेब सीरीज में चीजों को ज्यादा यथार्थ दिखाने की छूट मिली ही है तो उसे बेमतलब के एडल्ट सीन्स भर में क्यों समेटा जाए? क्या अच्छा नहीं होता कि और भी तमाम बातें अपने मूल स्वरूप में सामने आतीं. "मिर्जापुर" में देशकाल बहुत स्पष्ट नहीं है. पहली बात तो यह कि मिर्जापुर शहर में बाहुबली ताकतों का बोलबाला है, लेकिन उस कदर बेलगाम नहीं जिस तरह सीरीज में दिखाया गया है. यह भी साफ़ कर देना चाहिए कि सीरीज एक काल्पनिक कहानी पर आधारित है. मिर्जापुर में बेलगाम अपराध और तमाम बातें उस तरह हैं भी नहीं जैसे दिखाया गया है.

कहानी में कई जगह बड़े बड़े जर्क हैं. एसपी मौर्या के किरदार की एंट्री को लेकर जो दिखाया गया वो समझ से परे है. ये स्वाभाविक सी बात है कि जिस माफिया को वहां के राज्य की सत्ता (सीएम, यादवजी प्रोटेक्शन के लिए पैसा लेते हैं) का वरदहस्त प्राप्त होगा, भला वहां उसकी मर्जी के खिलाफ किसी अफसर की नियुक्ति कैसे की जा सकती है? और भला कालीन भैया जैसे माफिया के इलाके में कोई अफसर आता है तो वो उसके खिलाफ इतना आक्रामक कैसे हो सकता है.

सीरीज में दिखाया गया है कि एसपी मौर्या शहर में एनकाउंटर के लिए स्पेशल टीम बनाते हैं. पहला अटैक गुड्डू और बबलू पर होता है. इसकी वजह से दोनों को शहर छोड़कर अंडर ग्राउंड होना पड़ता है. लेकिन अचानक दोनों मिर्जापुर वापस लौट आते हैं. लौटकर शहर में ऐसे घूमते हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं. दोनों का इस तरह लौटना कहानी में एक बिखराव की तरह है. ठीक वैसे ही जैसे सीरीज के आगे बढ़ने के साथ साथ रमाकांत पंडित (राजेश तैलंग) का किरदार निरर्थक होता जाता है.

जैसे कालीन भैया, जो है तो बाहुबली पर नेता जी के आगे उसका किरदार कन्फ्यूजन का शिकार है. क्या हकीकत में पूर्वांचल में कालीन भैया जैसे ताकतवर बाहुबली, एक विधायक के आगे इतना मजबूर हो सकता है? ऐसी कहानियां तो लोगों ने बाहुबलियों के बारे में नहीं सुनी होंगी. तिग्मांशु धूलिया के निर्देशन में "साहेब बीवी और गैंगस्टर" में नेताओं के आगे माफियाओं का खासकर जिम्मी शेरगिल और इरफान का चरित्र लाजवाब था. मिर्जापुर में वो दब सा गया है.

सैक्रेड गेम्स से तुलना करे तो कहानी में बेमतलब की चीजें मिर्जापुर को एक साधारण वेब सीरीज बना देती है. अगर ऐसा है तो इसकी जिम्मेदारी निर्देशकों की है. लेखक ने जिस तरह से किरदारों को गढ़ा वह अपने मूल स्वरूप में आगे बढ़ ही नहीं पाया. यह हैरान करता है.

कहानियों में देशकाल का ध्यान रखा जाना चाहिए था. मिर्जापुर की काल्पनिक कहानी में इसकी कमी नजर आती है. कई चीजें बिना जरूरत के ठूंस दी गई हैं. पूरी कहानी में कारपेट के कारोबार का जिक्र तो है, लेकिन असल में वो कहीं दिखता नहीं है. दिखता है तो कारपेट की आड़ में कट्टों का कारोबार. जबकि कारपेट पूर्वांचल में वह कारोबार है जिसमें लगभग न के बराबर माफिया शामिल हैं.

मिर्जापुर समेत पूर्वांचल के तमाम अंचलों में माफियाओं के मुख्य काम प्रोटेक्शन के बदले फिरौती, कोयला सप्लाई, पेट्रोल पम्प, लोकनिर्माण विभाग के ठेके, रेल और रेत की ठेकेदारी, पहाड़ों पर माइनिंग और ईट भट्टों जैसे कारोबार हैं. अफीम की जगह शराब की ठेकेदारी, गांजों की और अफीम के छिलके का अवैध कारोबार में माफिया शामिल हैं. इसका एक पूरा नेटवर्क है.

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