Tuesday, March 19, 2019

क्या तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन मुस्लिम देशों का नेता बनने के लिए ऐसा कर रहे हैं?

तुर्की के राष्ट्रपति रैचेप तैयप अर्दोआन अपनी रैलियों में लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए न्यूज़ीलैंड हमले की हाल की घटना का वीडियो दिखा रहे हैं.

इसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी आलोचना हो रही है. कहा जा रहा है कि वो यह वीडियो दिखा कर अर्दोआन चुनाव को मुस्लिम बनाम ईसाई का रंग देना चाहते हैं.

बीते शुक्रवार को न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च इलाक़े में एक बंदूक़धारी ने दो मस्जिदों में घुस कर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई थीं, जिसमें पचास लोगों की मौत हो गई थी.

अर्दोआन ने कहा है कि हमलाबर ब्रेन्टन टैरन्ट तुर्कियों को यूरोप से दूर रखना चाहते हैं.

न्यूज़ीलैंड के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स ने तुर्की के अधिकारियों से इस पर आपत्ति जताई है और वीडियो दिखाने को "ग़लत" बताया है. उनका कहना है कि इससे विदेशों में रह रहे उनके नागरिकों की सुरक्षा ख़तरे में पड़ सकती है.

मस्जिद में गोलीबारी की घटना के हमलावर ने सोशल मीडिया पर इसका लाइव प्रसारण किया था, जिसे बड़ी संख्या में लोगों ने शेयर और डाउनलोड किया था. सोशल मीडिया ने बाद में इस वीडियो को अपने प्लैटफॉर्म से डिलीट कर दिया था.

न्यूज़ीलैंड में इस वीडियो के प्रसारण पर रोक लगा दी गई है. इतना ही नहीं इसे रखना और दूसरे को बांटने पर सज़ा देने का ऐलान किया गया है.

इस महीने के अंत में तुर्की में स्थानीय चुनाव होने वाले हैं. अपने समर्थन को मज़बूत करने के उद्देश्य से अर्दोआन ने रविवार की रैलियों में यह वीडियो दिखाया.

यह वीडियो दिखा कर वो रूढ़ीवादी सोच वाले लोगों को अपने साथ लाना चाहते हैं. उनका मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्लाम के ख़िलाफ़ पनपी सोच की निंदा करना था.

इसके साथ ही उन्होंने तुर्की के विपक्षी नेताओं को भी निशाने पर लिया और उन्हें "कमज़ोर" बताया.

अर्दोआन ने अपनी घोषणा में न्यूज़ीलैंड घटना के संदिग्ध द्वारा तुर्की के विशेष उल्लेखों की ओर इशारा किया.

उन्होंने कहा कि संदिग्ध दो बार तुर्की का दौरा कर चुका था और वो चाहता था कि तुर्की के मुसलमानों को तुर्की के यूरोपीय क्षेत्र से निकाल फेंका जाए.

न्यूज़ीलैंड के हमले का वीडियो कम से कम तीन रैलियों में बड़े स्क्रीन पर दिखाया गया था. अर्दोआन ने तुर्की की विपक्षी सीएचपी पार्टी के नेता मेकल क्लिकडारोग्लू की भी आलोचना की और उनके उस वीडियो को दिखाया, जिसमें वो "इस्लामिक देशों में आतंकवाद की जड़ें" होने की बात कह रहे हैं.

न्यूज़ीलैंड के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स ने तुर्की के उन अधिकारियों को अपनी आपत्ति जताई है, जो घटना के बाद तुर्की से न्यूज़ीलैंड दौरे पर आए थे.

इनमें तुर्की के विदेश मंत्री मेवलुत कावासोगलू भी शामिल थे.

विंस्टन पीटर्स ने कहा, "जो भी इस देश को ग़लत तरीक़े से प्रस्तुत करता है और देश के नागरिकों की सुरक्षा के लिए ख़तरा है, वो न्यूज़ीलैंड का नहीं हो सकता है."

"हमने इस मामले में तुर्की और अन्य देशों से लंबी बातचीत की है ताकि न्यूज़ीलैंड को ग़लत तरीक़ो से प्रस्तुत नहीं किया जा सके."

रैचेप तैयप अर्दोआन तुर्की के अब तक के दूसरे सबसे ताक़तवर नेता माने जाते हैं. उनसे पहले सिर्फ़ तुर्की के संस्थापक मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क या मुस्तफ़ा कमाल पाशा का नाम आता है.

वो मुसलमान और मुस्लिम राष्ट्रों के हितैशी बनना चाहते हैं और इस दिशा में वो देश से आगे अंतरराष्ट्रीय स्तर की घटनाओं पर भी अपनी दख़ल रखते हैं.

दुनियाभर में दो देश मुस्लिम राष्ट्रों के नेता बनना चाहते हैं- सऊदी अरब और तुर्की. जब भी सऊदी अरब किसी मसले पर अपनी प्रतिक्रिया देता है, तुर्की उसे काटने की कोशिश करता है.

सऊदी अरब को लगता है कि उसके यहां मक्का है और पैग़म्बर मुहम्मद का जन्म वहीं हुआ था, इसलिए वो दुनिया के इस्लामिक देशों का नेता है.

हालांकि तुर्की ख़ुद को सऊदी से ज़्यादा ताक़तवर मानता है और उसे लगता है कि वो मुसलमानों का सच्चा हितैशी है.

यही कारण है कि सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के मामले में भी तुर्की इसके ख़िलाफ़ मुखर था.

तुर्की में अर्दोआन के ऊपर कोई नहीं है. पिछले साल चुनावों में उनकी जीत के साथ ही अर्दोआन को कई नई ताक़तें मिलीं.

इन ताक़तों की जड़ में साल 2017 में उनकी अगुआई में हुआ एक जनमत संग्रह था. इसके मुताबिक़ तुर्की के राष्ट्रपति के पास अब वो सभी शक्तियां हैं जो पहले प्रधानमंत्री के पास हुआ करती थीं.

पिछले साल उनकी जीत के साथ ही तुर्की में प्रधानमंत्री का पद ख़त्म कर दिया गया था और उसकी सभी कार्यकारी शक्तियां राष्ट्रपति को स्थानानांतरित कर दी गई थीं.

अर्दोआन अब अकेले वो शख़्स होंगे जो वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर, मंत्रियों, जजों और उप राष्ट्रपति की नियुक्ति करते हैं.

अर्दोआन ही देश की न्यायिक व्यवस्था में दख़ल देते हैं, वो ही देश में बजट का बंटवारा करते हैं.

इतने अधिकारों के बाद कोई ऐसी संस्था या व्यक्ति नहीं है जो अर्दोआन के फ़ैसलों की समीक्षा करे.

नये संविधान के मुताबिक़, अर्दोआन न सिर्फ़ अगले कार्यकाल तक सरकार के सर्वेसर्वा बने रहेंगे बल्कि वो साल 2023 में भी चुनाव लड़ सकते हैं और जीतने पर साल 2028 तक सत्ता में बने रह सकते हैं.

Tuesday, March 12, 2019

力挺民营经济 中国瞄准市场“痛点”

  中新社北京3月12日电 (记者 李晓喻)一如此前各界预期,全国两会期间中国官方密集释放支持民营企业发展的信号。

  中共中央总书记、国家主席、中央军委主席习近平10日在参加十三届全国人大二次会议福建代表团审议时指出,要坚持“两个毫不动摇”,落实鼓励引导支持民营经济发展的各项政策措施,为各类所有制企业营造公平、透明、法治的发展环境,营造有利于企业家健康成长的良好氛围,帮助民营企业实现创新发展,在市场竞争中打造一支有开拓精神、前瞻眼光、国际视野的企业家队伍。

  国务院总理李克强亦在政府工作报告中称,要下大气力优化民营经济发展环境,按照竞争中性原则,在要素获取、准入许可、经营运行、政府采购和招投标等方面,对各类所有制企业平等对待。

  中国财经高官密集发声。中国财政部副部长刘伟透露,除系列减税降费政策外,还准备对现行政府采购政策进行部分调整,政府部门编制采购预算“至少留30%的额度面向中小企业”;央行副行长潘功胜称,针对小微企业融资难、融资贵问题,今年将加大工作力度;国家发展和改革委员会副主任连维良说,要为民营企业参与国企混合所有制改革“打开‘进’的大门”,重点领域允许社会资本进入,完全竞争领域允许其控股。

  力挺民营企业,官方有多重考量。一方面,民营企业贡献了中国一半以上的税收、60%以上的GDP和80%以上的城镇劳动就业。唯有切实提振民营经济,稳就业、稳外贸、稳投资、稳预期才有基础。

  另一方面,中国逾70%的技术创新成果都来自民营企业。扶持民企发展,是加速科技创新,培育新增长动能,推动经济加快转向高质量发展的题中应有之义。

  从全国两会期间透露的信息看,今后中国扶持民营企业措施将至少呈现三大特点。

  其一,更注重用改革的办法,营造公平竞争环境。

  政府工作报告明确,要努力打造良好营商环境,强调“公平竞争是市场经济的核心”,提出改革完善公平竞争审查和公正监管制度,加快清理妨碍统一市场和公平竞争的各种规定和做法。

  分析人士认为,此举切中了民企的最大“痛点”。用中国黄金集团首席经济学家万喆的话说,市场“不患贫而患不公”,对民企最好的扶持不是“吃小灶”,而是用更加连贯、一致、公开的制度和规则保障中性竞争、公平竞争,使企业无后顾之忧。

  国家行政学院经济学部教授冯俏彬也表示,创造更加公平、中性竞争的大环境,才能为市场主体提供更好发展空间,激发市场活力。

  其二,更多运用市场化手段,在多重目标中取得平衡。

  潘功胜称,在支持小微企业和民营企业融资过程中,要注重市场规律,坚持精准支持,选择符合国家产业发展方向、主业相对集中于实体经济、技术先进、产品有市场、暂时遇到困难的民营企业进行重点支持。

  这意味着,官方提振民营经济将兼顾稳增长、调结构、防风险等多重目标,不会盲目扩大对小微企业贷款而放松防范金融风险,也不会干扰市场正常优胜劣汰,影响结构转型升级。

  其三,更注重政策实施方式,确保民企有获得感。

  抓好小微企业普惠性减税政策落实;务必使企业特别是小微企业社保缴费负担有实质性下降;切实使中小微企业融资紧张状况有明显改善……政府工作报告针对提振民营经济多次出现“落实”“实质”“切实”表述。在此情况下,预计今年官方将在保证政策落地、评估实际效果上投入更多精力,民营经济“迎春”可期。(完)

Wednesday, March 6, 2019

अयोध्या पर 3 बार हुईं मध्यस्थता की कोशिशें, लेकिन अलग है SC की पहल

अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों से कहा कि अगर संभव हो सके तो मामले को मध्यस्थता से ही सुलझाया जाए. मस्जिद पक्ष मध्यस्थता की बात मानने के लिए तैयार है, लेकिन हिंदू महासभा इस पर सहमत नहीं है. अयोध्या मामले में पहली बार मध्यस्थता की कोशिश नहीं है. इससे पहले तीन बार ऐसी कोशिशों हो चुकी हैं, लेकिन विवाद किसी नतीजे के मुकाम तक नहीं पहुंच सकी. हालांकि पहली बार है जब कोर्ट की निगरानी में मध्यस्थता की पहल की जाएगी.

राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की गुंजाइश अब भी दिख रही है. यही वजह है कि अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने करीब डेढ़ घंटे की सुनवाई करने के बाद बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ये सिर्फ जमीन का मसला नहीं है, बल्कि भावनाओं से जुड़ा हुआ मामला है. ऐसे में इस मामले को दोनों पक्ष मध्यस्थता के जरिए मामले को सुलझाएं. हालांकि कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन एक्ट के तहत इस मामले में दोनों पक्षकार सुलझाएं.

मध्यस्थता के पक्ष में मुस्लिम पक्षकार

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने कहा कि हम अयोध्या जमीन विवाद और इसके प्रभाव को गंभीरता से समझते हैं और जल्दी फैसला सुनाना चाहते हैं. अगर पार्टियां मध्यस्थों का नाम सुझाना चाहती हैं तो दे सकती हैं. हालांकि हिंदू महासभा मध्यस्थता के खिलाफ है. जबकि निर्मोही अखाड़ा और मुस्लिम पक्ष मध्यस्थता के लिए राजी है. मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ही तय करे कि बातचीत कैसे हो? सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षकारों से मध्यस्थता के लिए आज शाम पांच बजे तक ही नाम देने को कहा है.

वीपी सिंह के दौर में मध्यस्थता की पहली कोशिश

दिलचस्प बात ये है कि अयोध्या मामले को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की इससे पहले कई कोशिशें हो चुकी हैं. पहली कोशिश 90 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह के समय में हुई, हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षकारों से बातचीत के सिलसिले भी शुरू हो गए. विवाद हल होता नजर आ रहा था और समझौते का ऑर्डिनेंस भी लाया जा रहा था. लेकिन सियासत ने ऐसी करवट ली कि वीपी सिंह सरकार को अयोध्या विवाद को सुलझाने वाले ऑर्डिनेंस को वापस लेना पड़ा.

चंद्रशेखर और नरसिम्हा राव के दौर में समझौते की हो चुकी पहल

वीपी सिंह के अयोध्या विवाद के समाधान की दूसरी पहल तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के दौर में शुरू हुई और ये समाधान के करीब थी. लेकिन दुर्भाग्य था कि उनकी सरकार चली गई. उसके बाद नरसिम्हा राव की सरकार ने प्रयास किया, लेकिन फिर भी अंतिम हल तक नहीं पहुंचा जा सका. इसके बाद सरकार के स्तर पर दोबारा समझौते के लिए कोई प्रयास नहीं हुआ.

अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 में कांची पीठ के शंकराचार्य के जरिए भी अयोध्या विवाद सुलझाने की कोशिश की थी. तब दोनों पक्षों से मिलकर जयेंद्र सरस्वती ने भी भरोसा दिलाया था, मसले का हल महीने भर में निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा तब भी कुछ नहीं हुआ.

हालांकि, व्यक्तिगत स्तर भी अयोध्या मामले की कई बार समझौते की पहल की जा चुकी हैं. आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकर ने पिछले दिनों हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षकारों से मिलकर मध्यस्थता की कोशिश की, लेकिन नाकामयाब रहे हैं. ऐसे में अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के निगरानी में होने वाले मध्यस्थता किस नतीजे पर पहुंचती है.

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