अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों से कहा कि अगर संभव हो सके तो मामले को मध्यस्थता से ही सुलझाया जाए. मस्जिद पक्ष मध्यस्थता की बात मानने के लिए तैयार है, लेकिन हिंदू महासभा इस पर सहमत नहीं है. अयोध्या मामले में पहली बार मध्यस्थता की कोशिश नहीं है. इससे पहले तीन बार ऐसी कोशिशों हो चुकी हैं, लेकिन विवाद किसी नतीजे के मुकाम तक नहीं पहुंच सकी. हालांकि पहली बार है जब कोर्ट की निगरानी में मध्यस्थता की पहल की जाएगी.
राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की गुंजाइश अब भी दिख रही है. यही वजह है कि अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने करीब डेढ़ घंटे की सुनवाई करने के बाद बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ये सिर्फ जमीन का मसला नहीं है, बल्कि भावनाओं से जुड़ा हुआ मामला है. ऐसे में इस मामले को दोनों पक्ष मध्यस्थता के जरिए मामले को सुलझाएं. हालांकि कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन एक्ट के तहत इस मामले में दोनों पक्षकार सुलझाएं.
मध्यस्थता के पक्ष में मुस्लिम पक्षकार
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने कहा कि हम अयोध्या जमीन विवाद और इसके प्रभाव को गंभीरता से समझते हैं और जल्दी फैसला सुनाना चाहते हैं. अगर पार्टियां मध्यस्थों का नाम सुझाना चाहती हैं तो दे सकती हैं. हालांकि हिंदू महासभा मध्यस्थता के खिलाफ है. जबकि निर्मोही अखाड़ा और मुस्लिम पक्ष मध्यस्थता के लिए राजी है. मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ही तय करे कि बातचीत कैसे हो? सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षकारों से मध्यस्थता के लिए आज शाम पांच बजे तक ही नाम देने को कहा है.
वीपी सिंह के दौर में मध्यस्थता की पहली कोशिश
दिलचस्प बात ये है कि अयोध्या मामले को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की इससे पहले कई कोशिशें हो चुकी हैं. पहली कोशिश 90 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह के समय में हुई, हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षकारों से बातचीत के सिलसिले भी शुरू हो गए. विवाद हल होता नजर आ रहा था और समझौते का ऑर्डिनेंस भी लाया जा रहा था. लेकिन सियासत ने ऐसी करवट ली कि वीपी सिंह सरकार को अयोध्या विवाद को सुलझाने वाले ऑर्डिनेंस को वापस लेना पड़ा.
चंद्रशेखर और नरसिम्हा राव के दौर में समझौते की हो चुकी पहल
वीपी सिंह के अयोध्या विवाद के समाधान की दूसरी पहल तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के दौर में शुरू हुई और ये समाधान के करीब थी. लेकिन दुर्भाग्य था कि उनकी सरकार चली गई. उसके बाद नरसिम्हा राव की सरकार ने प्रयास किया, लेकिन फिर भी अंतिम हल तक नहीं पहुंचा जा सका. इसके बाद सरकार के स्तर पर दोबारा समझौते के लिए कोई प्रयास नहीं हुआ.
अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 में कांची पीठ के शंकराचार्य के जरिए भी अयोध्या विवाद सुलझाने की कोशिश की थी. तब दोनों पक्षों से मिलकर जयेंद्र सरस्वती ने भी भरोसा दिलाया था, मसले का हल महीने भर में निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा तब भी कुछ नहीं हुआ.
हालांकि, व्यक्तिगत स्तर भी अयोध्या मामले की कई बार समझौते की पहल की जा चुकी हैं. आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकर ने पिछले दिनों हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षकारों से मिलकर मध्यस्थता की कोशिश की, लेकिन नाकामयाब रहे हैं. ऐसे में अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के निगरानी में होने वाले मध्यस्थता किस नतीजे पर पहुंचती है.
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